नई दिल्ली, 27 अगस्त (आईएएनएस)। नेशनल आई डोनेशन पखवाड़े को हर साल 25 अगस्त से 8 सितंबर तक मनाया जाता है, जो 1985 में शुरू हुआ था। इसका मुख्य उद्देश्य आंखों के दान के महत्व को बढ़ावा देना और कॉर्नियल ब्लाइंडनेस को कम करना है।
इस अवसर पर, अखंड ज्योति नेत्र अस्पताल के अकादमिक और अनुसंधान सलाहकार, Igims पटना के प्रोफेसर एमेरिटस और डॉ। आरपी सेंटर, एम्स नई दिल्ली के पूर्व निदेशक, डॉ। राजवर्धन झा आज़ाद ने समाचार एजेंसी आईएएनएस के साथ एक विशेष बातचीत की। उन्होंने आंखों के दान और भविष्य की दिशा की चुनौतियों पर प्रकाश डाला।
डॉ। आज़ाद ने कहा कि जागरूकता की कमी, धार्मिक गलतफहमी, ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकों की कमी और प्रशिक्षित सर्जनों की कमी प्रमुख चुनौतियां हैं। नेशनल ब्लाइंडनेस कंट्रोल प्रोग्राम (NPCBVI) के तहत आई दान को प्रोत्साहित किया जा रहा है। भविष्य में, ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में ‘I’ बैंक नेटवर्क का विस्तार करने, स्कूल-कॉलेजों में जागरूकता, मीडिया और धार्मिक नेताओं की बढ़ती भागीदारी पर जोर दिया गया है। लक्ष्य 2030 तक कॉर्नियल ब्लाइंडनेस को नियंत्रित करना है।
उन्होंने कहा कि एक दाता कॉर्निया कई लोगों को रोशन कर सकता है। कई मामलों में, बच्चों और युवाओं को प्रत्यारोपण से आजीवन दृष्टि मिली है।
डॉ। आज़ाद ने अपील की कि लोगों को जीवित रहते हुए आंखों के दान की प्रतिज्ञा लेनी चाहिए और परिवार को सूचित करना चाहिए, क्योंकि मृत्यु के बाद भी जीवन देने के लिए यह सबसे महान दान है।
आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर साल 25-30 हजार कॉर्निया प्रत्यारोपण होते हैं, जबकि जरूरत एक से डेढ़ लाख है। नेशनल आई डोनेशन पखवाड़े की शुरुआत के कारण दान की दर बढ़ गई है, लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना है। डॉ। आज़ाद ने समाज से इस महान काम में योगदान करने की अपील की।
समझाएं कि नेत्र दान एक ऐसा परोपकारी है, जो न केवल व्यक्तियों के जीवन को प्रकाश प्रदान करता है, बल्कि समाज में सकारात्मक बदलाव भी लाता है। नेत्र दान मृत्यु के बाद भी जीवन देने का अवसर है।
-इंस
Sch/as